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shaileshasthana


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नजर आया दूसरा हिंदुस्तान

Posted On: 3 Nov, 2010  
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देश की सर्वोच्च न्यायालय को शत-शत नमन।

Posted On: 3 Nov, 2010  
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राजनीति में योग गुरू

Posted On: 30 Oct, 2010  
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लिव इन कल्चर या रखैल कल्चर

Posted On: 25 Oct, 2010  
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अब कांपते नहीं मां बाप पर उठने वाले हाथ

Posted On: 22 Oct, 2010  
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कदम-कदम बढ़ाए जा

Posted On: 15 Oct, 2010  
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अयोध्या के बाद मथुरा और काशी का नंबर

Posted On: 4 Oct, 2010  
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सख्त न हुए तो खो देंगे काश्मीर

Posted On: 18 Sep, 2010  
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एक बार फिर अयोध्या की ओर निगाहें

Posted On: 17 Sep, 2010  
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टीवी चैनल के सहारे हिंदी अखबार

Posted On: 13 Sep, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' आदरणीय शैलेश जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

बड़े भाई को नमस्कार।  नेति क्रिया पहली बार आपने ही बताई थी।  हमने भले ही प्रयोग न किया हो मगर यह जरूर  जानते हैं कि जिसने इसे कर लिया उसे जुकाम नहीं होगा।  डाक्टरों के पास सबसे ज्यादा मरीज जुकाम के ही आते हैं।  अगर आयुर्वेद और योग का मेल हो जाय तो तय मानिए कि एक दिन  आएगा जब क्लीनिक भी बंद होंगे। वैसे आज की डेट में जितने लोग  अपने बच्चों को इंजीनियर बनाना चाहते हैं उसके चौथाई लोग ही  डाक्टर बनाना चाहते हैं। जाहिर है नौकरी की गारंटी या क्लीनिक  चलने की गारंटी नहीं है। पंतजलि केंद्रों पर  सामान महंगे हैं उनकी कीमत कम की जानी चाहिए।   फिर भी आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद।

के द्वारा:

के द्वारा:

माला जी आपका सवाल बिल्कुल जायज है। दरअसल समाज का जितना भी इतिहास ज्ञात है। उसमें शील की रक्षा लाज की रक्षा का भार महिलाओं पर ही रहा है। रामायण की बात करें तो सीता जी को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी और महाभारत काल की बात करें तो द्रौपदी को भी तमाम समस्याओं से रू-ब-रू होना पड़ा था। महिलाओं ने जब गलत रास्ता पकड़ा उन्हें तरह-तरह के नाम समाज ने दिए, मगर पथ भ्रष्ट पुरुषों के लिए समाज खामोश रहा। कबीर दास और मुंशी प्रेम चंद ने अपनी रचनाओं में इसे लेकर समाज का विरोध किया मगर कोई नामकरण वह भी नहीं दे पाए। इसके लिए कम से कम हम तो अपने आप को दोषी नहीं मान रहे। हां इतना जरूर कर सकते हैं कि पुरुषों के लिए भी कोई गंदा सा नाम दे दें। पुरुष रखैल या रखैला कह सकते हैं।  वैसे हम भी इस शब्द को इस नाते लिख सके क्योंकि देश के सर्वोच्च  न्यायालय ने अपने फैसले में इस शब्द का प्रय़ोग किया है।  बाद में इस रखैल शब्द को फैसले से हटाने के लिए हटाने के लिए भी याचिका  दायर की गई है। हमारा तो इतना ही मकसद था कि  समाज को ऐसे संबंधों (लिव इन) को समाज में जड़े  जमाने से पहले ही रोक देना चाहिए ताकि हमारी माता, बहनों और  बेटियों की प्रतिष्ठा बनी रहे। अगर नारी ऐसे उन्मुक्त संबंध अपनी  आजादी के नाम पर बनाती है तो समाज व्यवस्था टूट जाएगी  और अगले चरण में उन्मुक्त पुरुष छुट्टा पशु हो जाएंगे जिसकी कल्पना भी दुखद है।

के द्वारा:

के द्वारा:

अस्थाना जी आपने आधुनिक परिवार पर जो विचार व्यक्त किये हैं सराहनीय हैं। शास्त्रों में भी लिखा है माता-पिता गुरु देवता, पुराने समय में लोग साझा चूल्हा चलाते थे व प्रेम से मिलजुल कर रहा करते थे, परिवार वालों में अच्छे संस्कार, शादगी, बड़े-बूढ़ों का सम्मान था लेकिन आज का समय काफी फास्ट हो गया है हर इंसान दौड़ में आगे निकलना चाहता है, इसलिए उसके पास समय नहीं है मां-बाप बच्चे को पालते हैं अपनी हैसियत से अधिक बच्चे की पढ़ाई पर ध्यान दिया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चे को संस्कारवान बनाना होता है। जिससे वह दुनिया में अपना नाम कमाए। लेकिन वह मां-बाप को भूलने की कोशिश करने लगता है और उनका तिरस्कार कर एकाकी जीवन जीना चाहता है।

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सर बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है आपने लेख भी बहुत अच्छा है,लेकिन एक बात और भी है की एन सब के लिए कौन जिम्मेदार है.नीचे एक सज्जन ने लिखा है की माँ बाप ही उन्हें ऐसे संस्कार देते है एक बेटा होने के नाते मुझे ये पता है की माँ बाप ही बच्चे को सारे संस्कार नहीं देते,इसमे सबसे बड़ा हाथ है मनोरंजन के साधनों का जिनका उपभोग करने के लिए बेटे माँ बाप के साथ बदसलूकी करते है,बेरोजगारी का जिसकी वजह से जरा से पैसों के लिए लोग ऐसा करने लगे है.और कहीं न कहीं कुछ योगदान शिक्षा व्यवस्था का भी कहा जा सकता है.सर थोडा संक्षेप में लिख दिया है आशा करता हूँ की आपके एस लेख को पढ़कर युवा पीढ़ी जरूर ऐसा करने से बचेगी.हम तो ऐसे नहीं थे फिर क्यों हो गए ऐसे.ऐसा करने से आपको क्या मिलेगा आपको पैसा.....पुराने लोग कहावत कहते थे पैसा तो ..................! लेकिन उसकी कोई इज्ज़त नहीं होती..एक बात और समझना जमाना तुम्हारे बारे मैं क्या सोचता है इससे फर्क नहीं पड़ता लेकिन तुम्हारे माँ बाप तुम्हारे बारे में दिल से क्या सोचते है इससे जरूर फर्क पड़ता है.

के द्वारा:

अस्थाना जी आप की हर बात सटीक है, सच है | कश्मीरी mohammeddens में एक कहावत तब से चली आ रही है जब से पाकिस्तान बना था |\' जिउ जान बंझे हिन्दुस्तानस साथ, दिल छुम पाकिस्तानस साथ\' | यानी मजबूर कर के हमारे शरीर तो इंडिया के साथ बाँध दिए गए लेकिन दिल तो पकिस्तान के साथ है | करोड़ों नहीं , अरबों नहीं, खरबों की सब्सिडी खाकर भी जो लोग पाकिस्तान का झंडा लेकर छत पर चढ़ते हैं, उनसे यह आशा रखना मूर्खता है के वोह भारत को अपना समझेंगे | वैसे मैं अगर भारत का नीति निर्धारक होता तो कब से पीर पंजाल से परे का इलाका पाकिस्तान को इस शर्त पर सौंप चूका होता के सीमा पर कोई फेर बदल नहीं होगा | भारत की सेना वहीँ रहेगी जहाँ है | सिर्फ सारा सिविल इंतज़ाम पाकिस्तान को दे देता | जब ये लोग उसी तरह पिसते जिस तरह गुलाम कश्मीर के लोग पिस रहे हैं तभी इन्हें मजा आता | आप जाकर देखिये किसी किसी घर में ही बिजली का मीटर मिलेगा, बल्ब भी फ्री में दिए जाते हैं | इस लिए स्विच लगाने की भी ज़रूरत नहीं है | २४ घंटे मुफ्त की बिजली जल रही है | सेना भी अरबों का खर्च करके सिविल सहायता देती है | मौक़ा मिलते ही उन्हें भी अत्याचारी कहा जाता है | उनकी इस मुहीम में कुछ तथा कथित इंसानी फ़रिश्ते पत्रकार भी शामिल हो रहे हैं | पता नहीं उन्हें भी किरण बेदी की तरह मेगासेसे इनाम की तलाश है | मैं आप के पोस्ट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् देता हूँ |

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